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पेइचिंग
चीन की सरकार तिब्बत पर कब्जे के 70 साल बाद भी वहां के लोगों का दिल नहीं जीत पाई है। अब वहां की कम्युनिस्ट सरकार सीधे तौर पर तिब्बत की संस्कृति और उसकी भाषा को खत्म करने का प्रयास कर रही है। इतना ही नहीं, इस क्षेत्र में मूल तिब्बती लोगों की आबादी को कम करने के लिए यहां से जबरदस्ती मजदूरी के नाम पर लोगों को दूसरे राज्यों में भेजा जा रहा है। जबकि, चीन सरकार बाकी प्रांतों से बड़ी संख्या में गैर तिब्बती लोगों को यहां बसाने के प्लान पर काम कर रही है।

तिब्बत में चीनी लोगों की बसावट बढ़ी
एशिया टाइम्स की एक रिपोर्ट के अनुसार, तिब्बत से भागकर विदेश में बसने वाले टेरसिंग दोरजी ने 2005-06 से तिब्बत में पूरा साल बिताया था। उन्होंने धर्मशाला के तिब्बती सेंटर फॉर ह्यूमन राइट्स एंड डेमोक्रेसी को दिए एक इंटरव्यू में बताया कि 1959 के बाद से तिब्बत के इलाके में लोगों की बसावट नाटकीय तरीके से बदल गई है। यहां के लोग अब तिब्बती भाषा को पसंद नहीं करते हैं। उन्हें मंडारिन या अंग्रेजी बोलना अच्छा लगता है।

जल्द खत्म हो जाएगी तिब्बती लिपि
दोरजी ने बताया कि लिखित तिब्बती भाषा पहले से ही संकटो का सामना कर रही थी। अब इस क्षेत्र में बड़ी संख्या में चीनी लोगों के बस जाने से इस भाषा के खत्म होने का खतरा मंडराने लगा है। बहुत जल्द ही तिब्बती लिपि का इस इलाके से नामों निशान मिट जाएगा। इसके पीछे बड़ी वजह चीन की कम्युनिस्ट पार्टी है।

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रेलवे ने बड़ी संख्या में गैर तिब्बती लोगों को यहां पहुंचाया
त्सोंगोंन-ल्हासा रेलवे (किंघाई-तिब्बत रेलवे) ने अपने ऑपरेशन के पहले ही साल यानी 2007 में 15 लाख लोगों को तिब्बत पहुंचाया था। इसके 13 साल के ऑपरेशन के दौरान अब 2020 में तिब्बत की जनसांख्यिकी पूरी तरह से बदल गई है। बड़ी संख्या में दूसरी भाषा बोलने वाले लोग हमारे इलाकों में पहुंचकर रहने लगे हैं। इससे न केवल तिब्बत के सांस्कृतिक बल्कि भाषा पर अब गंभीर खतरा पैदा हो गया है।

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मंडारिन भाषा का हर जगह बोलबाला
2008 के शांतिपूर्ण विद्रोह तिब्बती लोगों के आर्थिक, सामाजिक और सांस्कृतिक अधिकारों और धार्मिक भावनाओं को कम करने का ही परिणाम था। तिब्बत में बढ़ती चीनी आबादी के कारण अब अधिकांश सेवाएं और सुविधाओं में उन्हीं का ध्यान रखा जाता है। रेलवे, बस स्टेशन, शॉपिंग मॉल आदि जगहों पर अब अंग्रेजी के अलावा मंडारिन भाषा में सबकुछ लिखा रहता है।

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आवागमन के लिए सड़कें बना रहा तीन
चीन की कम्युनिस्ट पार्टी ने रोमन साम्राज्य की नकल करते हुए 1951 में तिब्बत पर कब्जे के तुरंत बाद इस इलाके में बड़े पैमाने पर सड़क निर्माण का काम शुरू किया था। सड़कों को बनाने के पीछे चीन का मकसद युद्ध के दौरान अपनी सेना की तुरंत तैनाती करना था। चीन ने इसी सड़कों की बदौलत 1962 में भारत से युद्ध के दौरान बढ़ता हासिल की थी।

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