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आपस में लड़ते हुए दो देश वास्तव में कैसे दिखते हैं, यह समझ में तब आता है जब हमारी नजर ऐसे दो देशों की लड़ाई पर जाती है जिनसे हमारा कोई सीधा जुड़ाव न बनता हो। वरना होता यह है कि दोनों में से कोई एक हमें कम बुरा या ज्यादा बदमाश प्रतीत होता है। ऐसा होते ही हमारी सहानुभूति किसी एक के पक्ष में चली जाती है। इसके बाद पूरी बुराई हमें दूसरे पक्ष में नजर आने लगती है और लड़ाई के चरित्र का सवाल गायब हो जाता है। चरित्र का सवाल इसलिए अहम है क्योंकि कोई युद्ध इंसानियत के लिए दवा है या जहर, इसका फैसला इसी से हो सकता है, और नजर में थोड़ी सी निष्पक्षता न हो तो इसका परीक्षण मुश्किल हो जाता है। बहरहाल, इस समय दुनिया में दो ऐसे देशों के बीच युद्ध चल रहा है जो कम से कम हिंदुस्तान के ज्यादातर लोगों के लिए इतने जाने पहचाने नहीं हैं कि वे इस लड़ाई में एक पक्ष बनने को उत्सुक हो उठें। लिहाजा युद्ध से जुड़े सभी पहलुओं पर न सही, कुछ अहम पहलुओं पर एक निरपेक्ष दृष्टि हम इस लड़ाई के सहारे डाल सकते हैं।

अजरबैजान के शहर टेर्टर में गोलीबारी से बचने के लिए बेसमेंट में छिपे लोग

दावे और प्रतिदावे
ये दो देश हैं कॉकेशस क्षेत्र के दो पड़ोसी अजरबैजान और आर्मीनिया। दोनों देशों के बीच युद्ध का लंबा इतिहास रहा है, लेकिन ताजा दौर की लड़ाई शुरू हुई 27 सितंबर को। जैसा कि आम तौर पर होता है, इस युद्ध में भी अगर आप किसी एक पक्ष पर आंख मूंदकर विश्वास करने को बाध्य नहीं हैं तो यह समझना मुश्किल है कि लड़ाई वास्तव में किसने शुरू की और कौन इसके लिए जिम्मेदार है। दोनों पक्ष एक-दूसरे को दोषी ठहरा रहे हैं और उनके दावों की सचाई परखने का कोई तरीका युद्धभूमि से दूर बैठे लोगों के पास नहीं है।

कायदे से हमें एक नजर इस पर भी डालना चाहिए कि आखिर यह लड़ाई शुरू क्यों हुई और 10 अक्टूबर को एक बार युद्ध विराम की घोषणा हो जाने के बावजूद थमने का नाम क्यों नहीं ले रही। लेकिन ऐसा कोई न कोई किस्सा तो हर लड़ाई के साथ जुड़ा होता है। उसे लंबा खींचने वाले कई तरह के कारक भी होते हैं। उनमें उलझने पर दूसरी कुछ जरूरी बातें छूट सकती हैं। सो, संक्षेप में इतना समझ कर आगे बढ़ चलते हैं कि इस लड़ाई की जड़ में नागोर्नो-काराबाख नाम का करीब साढ़े चार हजार वर्ग किलोमीटर क्षेत्रफल और डेढ़ लाख की आबादी वाला एक बेहद खूबसूरत इलाका है, जो है तो अजरबैजान का हिस्सा लेकिन राज वहां किसी और का चलता है। मसला यह है कि अजरबैजान एक शिया बहुल मुस्लिम देश है जबकि नागोर्नो-काराबाख की ज्यादातर आबादी ईसाई है जो पड़ोस के ईसाई बहुल देश आर्मीनिया से ज्यादा करीबी महसूस करती है।

यह इस दिलचस्प प्रेम त्रिकोण का पहला स्तर है। इसके दूसरे स्तर पर इसी इलाके के दो ताकतवर देश खड़े नजर आते हैं- रूस और तुर्की। तुर्की का सीधा तर्क यह है कि अजरबैजान के मुस्लिम भाइयों को वह अकेला नहीं छोड़ सकता। हालांकि तुर्की सुन्नी बहुल देश है जबकि अजरबैजान में शिया आबादी है, लेकिन इस विपरीतता को बेअसर करती हुई तुर्की को अजरबैजान से जोड़े रखने वाली चीज भाषा है। अजरबैजान के लोग भले शिया हों, लेकिन बोलते वे टर्किश ही हैं। रूस की स्थिति थोड़ी विचित्र इस मामले में है कि आर्मीनिया से जरा ज्यादा सहानुभूति रखते हुए भी वह इसे खुलकर जाहिर नहीं कर पा रहा क्योंकि ये दोनों ही देश सोवियत संघ का हिस्सा रहे हैं और आज भी दोनों रूस के प्रभाव क्षेत्र में आते हैं।

बहरहाल, दोनों पक्षों को अलग-अलग करने वाले इन ब्योरों से ज्यादा दिलचस्प हैं वे बातें जो इस लड़ाई के दौरान भी दोनों देशों के नेतृत्व को एक ही पाले में रखती हैं। 27 सितंबर को युद्ध शुरू हुआ और 28 सितंबर को आर्मीनिया सरकार ने 18 साल से ऊपर के उन सभी लोगों के देश से बाहर जाने पर पाबंदी लगा दी जो मोबिलाइजेशन रिजर्व लिस्ट में शामिल थे। अगले ही दिन आर्मीनिया में टिकटॉक बंद हो गया। बैन की घोषणा भले न हुई हो, आम लोगों की उस तक पहुंच रोक दी गई। इसके बाद देशद्रोह के संदेह में गिरफ्तारियां होने लगीं, मार्शल लॉ को और अधिक कड़ा कर दिया गया और राज्य के विभिन्न अंगों की आलोचना पर पाबंदी लगा दी गई।

अजरबैजान के लोगों की स्थिति भी इससे अलग नहीं रही। इंटरनेट तक पहुंच पर रोक तो 27 सितंबर को ही लग गई थी। 28 सितंबर को राजधानी बाकू सहित सभी प्रमुख शहरों में कर्फ्यू भी लगा दिया गया। साफ है कि दुश्मन सेना के हमलों में जान-माल के नुकसान से अलग और युद्ध के खर्चों के अलावा दोनों देशों के आम लोगों को अपने नागरिक अधिकारों पर हमला भी झेलना पड़ रहा है। मगर इन सबसे एकदम अलग एक और सवाल है जो अजरबैजान और आर्मीनिया के बीच चल रही इस लड़ाई से जुड़ता है। जैसा कि अब तक स्पष्ट हो चुका है दोनों देशों के बीच चल रही लड़ाई में एक प्रमुख कारक है इन देशों की जनता की अलग-अलग धार्मिक और भाषाई पहचान।

मनुष्य का मन
ध्यान रहे कि ये दोनों देश 1921 में ही सोवियत संघ का हिस्सा हो गए थे। इस पूरे दौर में सोवियत संघ के खिलाफ और चाहे जो भी कहा जाए, जातीय और धार्मिक पहचानों के आधार पर किसी तरह के भेदभाव या उत्पीड़न का कोई आरोप नहीं लगाया जा सकता। बल्कि, शासन की कोशिश अगर कुछ थी तो इन पहचानों को कमजोर करने की ही थी। बावजूद इसके, सात दशक के बाद जब ये देश अलग होने की स्थिति में आए तो यही पहचानें इनके टकराव का आधार बनीं। सवाल कहें या सबक, मनुष्यता के लिए यह है कि मनुष्य के मन में बदलाव की प्रक्रिया शायद उससे ज्यादा जटिल है, जितनी हम उसे समझते रहे हैं।

डिसक्लेमर : ऊपर व्यक्त विचार लेखक के अपने हैं



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