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कई विधानसभा चुनावों के बाद यह पहला मौका है, जब समाजवादी पार्टी बिहार विधानसभा चुनाव में हिस्सा नहीं ले रही है। पार्टी चुनाव में राष्ट्रीय जनता दल को समर्थन देने का ऐलान कर चुकी है। वर्ष 2005 के चुनाव में चार सीट जीतने वाली समाजवादी पार्टी का यह निर्णय महागठबंधन के लिए उन सीट पर फायदेमंद साबित हो सकता है, जहां मुकाबला बेहद करीब है।

बिहार विधानसभा चुनाव में समाजवादी पार्टी की गैर मौजूदगी का सीधा फायदा राजद-कांग्रेस गठबंधन को मिलेगा। क्योकि, महागठबंधन और समाजवादी पार्टी का वोट बैंक एक है। ऐसे में सपा चुनाव में जितने भी वोट हासिल करती, उसका सीधा नुकसान महागठबंधन को होता। हालांकि, पिछले कई चुनावों से बिहार में समाजवादी पार्टी को वोट प्रतिशत लगातार कम हो रहा है।

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वर्ष 2005 के चुनाव में सपा को 2.7 फीसदी वोट के साथ चार सीट मिली थी। पर 2010 के चुनाव में सपा एक भी सीट जीतने में विफल रही। वर्ष 2015 के चुनाव के शुरुआत में सपा महागठबंधन के साथ थी, सीट बंटवारे पर मतभेद के बाद पार्टी ने महागठबंधन से अलग होकर चुनाव लड़ा। पर तमाम कोशिशों के बावजूद पार्टी एक फीसदी वोट हासिल कर पाई।

समाजवादी पार्टी का बिहार में भले ही एक फीसदी वोट हो, पर यह महागठबंधन के उम्मीदवारों के लिए कई सीट पर निर्णायक साबित होगा। खासकर उनकी सीट पर जहां हार-जीत का अंतर एक या दो हजार से कम हो। वर्ष 2015 के चुनाव में सात सीट पर हार-जीत का अंतर एक हजार से कम था। इनमें से चार सीट भाजपा और जेडीयू ने जीती थी।

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पार्टी के अंदर एक बड़ा तबका सपा के बिहार चुनाव से अलग रहने को नेतृत्व परिवर्तन से भी जोड़कर देख रहा है। क्योंकि, पार्टी की कमान अब अखिलेश यादव के पास है। पर साथ ही वह मानते हैं कि सपा के बिहार में चुनाव लड़ने का सीधा असर यूपी पर पड़ता। चुनाव लड़ने से यह संकेत जाता कि पार्टी भाजपा को लाभ पहुंचाने के लिए विधानसभा चुनाव लड़ रही है।

राजद और सपा का वोट बैंक एक
राजद और सपा का वोट बैंक एक है। दोनों पार्टियां यादव और मुसलिम समीकरण की राजनीति करते हैं। सपा के एक नेता ने कहा कि मौजूदा राजनीतिक स्थिति में चुनाव लड़ने से गैर भाजपा-जेडीयू वोट का विभाजन होता। इसका सीधा नुकसान राजद-कांग्रेस गठबंधन को होता। यह बात बिहार तक रहती तो भी ठीक थी, पर इससे यूपी में गलत संदेश जाता।

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