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करीब तीन दशक बाद यहां की राजनीति में सवर्ण राजनीति लौटती दिख रही है। टिकट बंटवारे में करीब-करीब सभी दलों ने सवर्णों को तवज्जो दी है। अमूनन राजद और जदयू दलित-पिछड़ों की राजनीति करते रहे हैं। इस बार सवर्ण का खास ख्याल रखा गया है। भाजपा ने तो खुलकर सवर्णों को टिकट दिया है। दलित-पिछड़ों की राजनीति करने वाले रामविलास पासवान की पार्टी लोजपा भी सवर्णों को जोड़ने में पीछे नहीं है। हालांकि, नीतीश कुमार ने जदयू में सोशल इंजीनियरिंग के तहत अपने जनाधार वाली जातियों के अलावा महिलाओं के साथ-साथ सवर्णों को भी उम्मीदवार बनाया है। बिहार में सवर्ण राजनीति फिर लौटती दिख रही है।

60 फीसदी तक सवर्ण उम्मीदवार

अभी तक के टिकट वितरण पर निगाह डालें तो भाजपा ने 60 फीसदी सवर्ण उम्मीदवार मैदान में उतारे हैं। कांग्रेस में भी सवर्ण उम्मीदवार करीब-करीब इतने ही हैं। जदयू ने भी इस बार पहले के मुकाबले ज्यादा सवर्णों को मौका दिया है। राजद ने भी अपनी रणनीति में बदलाव किया है। पार्टी ने इस बार अब तक 10 फीसदी से ज्यादा सवर्णों को टिकट दिया है। सवर्णों को साधने के लिहाज से ही उसने अपने पार्टी के कद्दावर नेताओं के रिश्तेदारों को मैदान में उतारा है। दलित राजनीति करने वाली लोजपा ने 35 फीसदी से ज्यादा सवर्णों को टिकट दिया है।

हिंदुत्व बनाम धर्मनिरपेक्षता

धर्मनिरपेक्ष राजनीति के बीच भाजपा के हिंदुत्व एजेंडे ने कांग्रेस और राजद को भी मंथन पर मजबूर कर दिया है। यही वजह है माई समीकरण वाले राजद में मुसलमानों को पहले के चुनावों की तुलना में कम टिकट मिले हैं। दीगर बात है कि मुस्लिम बाहुल्य मतदाताओं वाले विधानसभा निर्वाचन क्षेत्र में आगे चुनाव होने हैं। इसी तरह, पहले चरण में कांग्रेस ने मात्र एक मुस्लिम उम्मीदवार को मैदान में उतारा है।

1990 के बाद इस चुनाव में दबदबा

1989-90 के बाद सवर्ण राजनीति यहां घोर विरोध का शिकार हुई। 1990 में डॉ जगन्नाथ मिश्र चुनाव हारे और लालू प्रसाद सत्तासीन हुए। राजनीति ने ऐसी करवट ली कि जनता दल नेताओं ने खुले मंच से सवर्णों (भू-भूमिहार, रा- राजपूत, बा- ब्राह्मण- ल- कायस्थ यानी भूरावाल) को कोसना शुरू किया। ओबीसी, दलित और बीसी गोलबंदी ने लालू-नीतीश की जोड़ी को खूब मजबूती दी। 1992 में ब्राह्मणों ने कांग्रेस का साथ छोड़ा और भाजपाई हो गए। इसी समय दलित राजनीति को रामविलास पासवान ने हवा दी, ओबीसी राजनीति पर लालू और नीतीश कुमार बंटे। 1994 में समता पार्टी बनी। नीतीश की समता पार्टी ने भी सवर्ण विरोधी राजनीति को हवा दी।

1995 आते-आते सवर्ण राजनीति को मजबूती देने की कोशिशें तेज हुईं। राजपूत और भूमिहार नेता खुलकर सामने आने लगे। 2003 में जदयू के गठन के साथ नीतीश कुमार ने अपने पुराने रुख को बदला और सवर्ण के एक तबके भूमिहार को अपने पाले में लाने में सफल हुए। अब 2020 में सभी दलों को बिहार के सवर्ण मतदाताओं की चिंता सताने लगी। भले सुशांत सिंह राजपूत की मौत में हत्या की आशंकाओं की हवा निकल गई लेकिन टिकट पाने वाले सवर्णों में भी राजपूत उम्मीदवारों को सभी दलों ने अहमियत दी है।

सार

  • सभी दलों ने टिकट बंटवारे में सवर्ण उम्मीदवारों को तवज्जो दी 
  • महादलितों की राजनीति करने वाली लोजपा भी इससे अछूती नहीं 

विस्तार

करीब तीन दशक बाद यहां की राजनीति में सवर्ण राजनीति लौटती दिख रही है। टिकट बंटवारे में करीब-करीब सभी दलों ने सवर्णों को तवज्जो दी है। अमूनन राजद और जदयू दलित-पिछड़ों की राजनीति करते रहे हैं। इस बार सवर्ण का खास ख्याल रखा गया है। भाजपा ने तो खुलकर सवर्णों को टिकट दिया है। दलित-पिछड़ों की राजनीति करने वाले रामविलास पासवान की पार्टी लोजपा भी सवर्णों को जोड़ने में पीछे नहीं है। हालांकि, नीतीश कुमार ने जदयू में सोशल इंजीनियरिंग के तहत अपने जनाधार वाली जातियों के अलावा महिलाओं के साथ-साथ सवर्णों को भी उम्मीदवार बनाया है। बिहार में सवर्ण राजनीति फिर लौटती दिख रही है।

60 फीसदी तक सवर्ण उम्मीदवार

अभी तक के टिकट वितरण पर निगाह डालें तो भाजपा ने 60 फीसदी सवर्ण उम्मीदवार मैदान में उतारे हैं। कांग्रेस में भी सवर्ण उम्मीदवार करीब-करीब इतने ही हैं। जदयू ने भी इस बार पहले के मुकाबले ज्यादा सवर्णों को मौका दिया है। राजद ने भी अपनी रणनीति में बदलाव किया है। पार्टी ने इस बार अब तक 10 फीसदी से ज्यादा सवर्णों को टिकट दिया है। सवर्णों को साधने के लिहाज से ही उसने अपने पार्टी के कद्दावर नेताओं के रिश्तेदारों को मैदान में उतारा है। दलित राजनीति करने वाली लोजपा ने 35 फीसदी से ज्यादा सवर्णों को टिकट दिया है।

हिंदुत्व बनाम धर्मनिरपेक्षता
धर्मनिरपेक्ष राजनीति के बीच भाजपा के हिंदुत्व एजेंडे ने कांग्रेस और राजद को भी मंथन पर मजबूर कर दिया है। यही वजह है माई समीकरण वाले राजद में मुसलमानों को पहले के चुनावों की तुलना में कम टिकट मिले हैं। दीगर बात है कि मुस्लिम बाहुल्य मतदाताओं वाले विधानसभा निर्वाचन क्षेत्र में आगे चुनाव होने हैं। इसी तरह, पहले चरण में कांग्रेस ने मात्र एक मुस्लिम उम्मीदवार को मैदान में उतारा है।

1990 के बाद इस चुनाव में दबदबा

1989-90 के बाद सवर्ण राजनीति यहां घोर विरोध का शिकार हुई। 1990 में डॉ जगन्नाथ मिश्र चुनाव हारे और लालू प्रसाद सत्तासीन हुए। राजनीति ने ऐसी करवट ली कि जनता दल नेताओं ने खुले मंच से सवर्णों (भू-भूमिहार, रा- राजपूत, बा- ब्राह्मण- ल- कायस्थ यानी भूरावाल) को कोसना शुरू किया। ओबीसी, दलित और बीसी गोलबंदी ने लालू-नीतीश की जोड़ी को खूब मजबूती दी। 1992 में ब्राह्मणों ने कांग्रेस का साथ छोड़ा और भाजपाई हो गए। इसी समय दलित राजनीति को रामविलास पासवान ने हवा दी, ओबीसी राजनीति पर लालू और नीतीश कुमार बंटे। 1994 में समता पार्टी बनी। नीतीश की समता पार्टी ने भी सवर्ण विरोधी राजनीति को हवा दी।

1995 आते-आते सवर्ण राजनीति को मजबूती देने की कोशिशें तेज हुईं। राजपूत और भूमिहार नेता खुलकर सामने आने लगे। 2003 में जदयू के गठन के साथ नीतीश कुमार ने अपने पुराने रुख को बदला और सवर्ण के एक तबके भूमिहार को अपने पाले में लाने में सफल हुए। अब 2020 में सभी दलों को बिहार के सवर्ण मतदाताओं की चिंता सताने लगी। भले सुशांत सिंह राजपूत की मौत में हत्या की आशंकाओं की हवा निकल गई लेकिन टिकट पाने वाले सवर्णों में भी राजपूत उम्मीदवारों को सभी दलों ने अहमियत दी है।

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