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हाइलाइट्स:

  • बिहार विधानसभा चुनाव में भारतीय कम्यूनिस्ट पार्टी (माओवादी-लेनिनवादी) को 12 सीटें मिली हैं
  • पार्टी प्रमुख दीपांकर भट्टाचार्य का कहना है कि इस बार उनकी पार्टी के अजेंडों पर चुनाव हुआ है
  • दीपांकर ने महागठबंधन के प्रदर्शन पर संतोष जताया और कहा अब लड़ाई जहां तक पहुंची, वह खराब नहीं है

नई दिल्ली
बिहार में नीतीश कुमार की अगुवाई वाली एनडीए सरकार सत्ता में आ चुकी है लेकिन कांटे की लड़ाई में कई नए सियासी ट्रेंड सामने आए हैं। इसमें एक सबसे अहम था राज्य की राजनति में वाम दलों के उभरने का संकेत। महागठबंधन का हिस्सा बनीं लेफ्ट पार्टियों ने बेहतर प्रदर्शन किया और 29 सीटों में 16 सीटें जीत लीं। इनमें सबसे अधिक 12 सीटें सीपीआई-एमएल ने जीतीं जो 19 सीटों पर खड़ी थी। लेकिन, बड़े सवाल यह हैं कि आखिर महागठबंधन बहुमत तक क्यों नहीं पहुंच पाया? अब आगे की राजनीति में लेफ्ट दलों की क्या भूमिका होगी? क्या लेफ्ट की राजनीति में बदलाव आया है? इन तमाम मसलों पर सीपीआई- एमएल के राष्ट्रीय महासचिव दीपांकर भट्टाचार्य से बात की एनबीटी के नरेन्द्र नाथ। पेश है बातचीत के अहम अंश…

1. सवाल-बिहार में कई सालों बाद लेफ्ट पार्टियों ने बेहतर चुनावी सफलता पाई है। क्या वजह है?

जवाब- बिहार का चुनाव इस बार खास किस्म का रहा है। यह चुनाव नहीं बल्कि आंदोलन की शक्ल में आगे बढ़ा। युवाओं का उभार हुआ,उनसे जुड़े मुद्दों से माहौल बना। यही हालात लेफ्ट के लिए अनुकूल हैं। कई सालों से लेफ्ट जिस तरह की राजनीति करती रहा है, जिन एजेंडों की बात करता रहा है, इस बार उन्हीं मसलों पर बिहार में चुनाव में हुए। लॉकडाउन के माहौल में नीतीश-मोदी की डबल इंजिन सरकार बिना ड्राइवर के चली। लोगों को अपने भरोसे छोड़ दिया गया। हम पहले से ही लोगों की मदद करते हुए जमीन पर थे। इसके बाद एक मजबूत गठबंधन बना। मतों का विभाजन नहीं हुआ। इस तरह हम बिहार में ठीक-ठाक करने में सफल हुए।

2. सवाल- बीजेपी ने अपने चुनाव प्रचार में आपकी पार्टी को अरबन नक्सल कहकर पुकारा, इसे जंगलराज से जोड़ा।

जवाब- इस बार नैरेटिव हमने सेट किया। बीजेपी ने तो बार बार-बार हमारा नाम लेकर हमारा प्रचार ही किया। उनके आरोप के बाद जब लोगों ने देखा तो पाया कि हम हमेशा गरीबों का काम करते रहे हैं। हम तो जेपी नड्डाजी के पार्टी के आभारी हैं। और बिहार से एक शुरूआत हुई है। अभी पूरे देश में लेफ्ट के उभरने का समय आ गया है। जिस तरह से आर्थिक नीतियों के कारण विषमता बढ़ी है, उससे लेफ्ट का आधार बढ़ेगा। इन दिनों चलन देखिए कि जो खड़ा होता है, वही लेफ्ट कह दिया जाता है। हर विरोध की आवाज को लेफ्ट कहना हमारी लड़ाई को एक तरह से पहचान देना ही है।

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3. सवाल- फिर बहुत करीब आकर सत्ता से दूर रह गए। इतनी एंटी इनकंबेसी के बावजूद भी पूरी तरह जीत क्यों नहीं मिल सकी?

जवाब- अभी समीक्षा करनी होगी। कई सीटों पर हमारा गठबंधन बहुत कम अंतर से हारा। उन मामलों को भी देख रहे हैं। बूथवार आंकड़े मंगाए जा रहे हैं। वोटों की दोबारा गिनती की हमारी मांग खारिज कर दी गई, लेकिन इन बातें के इतर अगर देखें तो एक महीना पहले तक हर कोई कह रहा था कि राज्य में कोई लड़ाई नहीं है। अगर उस हिसाब से देखेंगे कि अब लड़ाई जहां तक पहुंची, वह एक तरह से खराब भी नहीं है। सत्ता के दबदबे के बीच कहीं विपक्ष का स्पेस नहीं बच रहा था। हर संस्थान पर कब्जा किया जा रहा था। ऐसे में बिहार जैसे राज्य में मजबूत विपक्ष बनने का यह परिणाम खराब नहीं माना जाएगा।

4. सवाल- ऐसा कहा गया कि गठबंधन में सीटों का बंटवारा ठीक नहीं हुआ। अगर ठीक होता तो और बेहतर परिणाम हो सकते थे।

जवाब- सीटों का बंटवारा संतुलित किया जा सकता था। कांग्रेस को जो 70 सीट दिए गए, वह उसे संभाल नहीं सकी। कांग्रेस अपनी सीटें कुछ कम कर सकती थी। हमें कुछ और सीटें मिल सकती थी। आरजेडी कुछ और सीट अपने दम पर लड़ सकता था। इन सबसे और हम बेहतर कर सकते थे।

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5. सवाल- कहा गया कि सीमांचल में ओवैसी की पार्टी ने बहुत खेल बिगाड़ा। कांग्रेस हार के लिए उनपर भी आरोप लगा रही है। आप क्या मानते हैं?

जवाब- हमें लगता है कि हम कुछ अधिक प्रतिक्रिया दे रहे हैं। कुछ लोग ओवैसी पर आरोप लगा रहे हैं। लोकतंत्र में हर कोई चुनाव लड़ सकता है। इसपर कोई आपत्ति नहीं की जा सकती है। वोटर को दोष नहीं दिया जा सकता है। हमें इस मामले को दूसरी तरह देखना चाहिए कि हैदराबाद की पार्टी को बिहार में जगह क्यों मिल रही है। एक बड़ा कारण है कि मुस्लिम की नई पीढ़ी से अधिकतर दल संवाद नहीं कर पा रहे हैं। कांग्रेस को मुस्लिम जवानों से संवाद करना चाहिए। संवादहीनता और भरोसे की कमी है। अधिकतर विपक्षी दल मुस्लिमों के मसले पर वैचारिक दबाव में आ जाते हैं। इन मुद्दों पर लड़ना चाहिए। सीएए-एनआरसी पर कोई नहीं बोला। इस मुस्लिम का मुददा बना दिया गया जबकि यह संविधान का मामला था। आत्ममंथन करना चाहिए।

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6. सवाल- कहा गया कि इस चुनाव में लेफ्ट, खासकर माले ने अपनी छवि बदलने की कोशिश की। क्यों जरूरत पड़ी?

जवाब- कुछ नहीं बदला। हालात के हिसाब से चीजें बदलती हैं। हमने हमेशा एक ही संघर्ष किया- गरीबों के लिए। पहले गरीबों के मान-सम्मान से शुरू किया। फिर हक अधिकार की लड़ाई लड़ी। जैसे सत्तर के दशक में खटिया पर बैठना तक एक मुद्दा था। अस्सी के दशक में वोट डालना मुद्दा बना। बाद में मजदूरी मांगना सवाल बना। आज वही समान काम के लिए समान वेतन, शिक्षा, स्वास्थ्य का मसला है। निजीकरण का विरोध है। आरक्षण का मामला। अच्छी बात है कि आज ये मसले सिर्फ लेफ्ट नहीं, सभी उठा रहे हैं। पहले ट्रेड यूनियन लड़ते थे। अब समाज और लोग जुड़ रहे हैं क्योंकि महंगी शिक्षा और महंगा इलाज आम लोगों की पहुंच के बाहर है।

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