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कोरोना काल में जरूरी सामानों की खरीद ऑनलाइन माध्यम से ज्यादा हो रही है। इससे ऑनलाइन व्यापार तेजी से मजबूत हो रहा है, तो इसी के साथ छोटे-मझोले दुकानदारों पर उनकी रोजी-रोटी छिनने का खतरा भी मंडराने लगा है। ऑनलाइन बाजार में अलग-अलग क्षेत्रों में 50 से 70 फीसदी प्रतिवर्ष तक की बढ़ोतरी दर्ज की जा रही है। इससे खुदरा और असंगठित क्षेत्र में करोड़ों लोगों की नौकरियों पर खतरा पैदा हो गया है। त्योहारी सीजन की शुरुआत के साथ ही ऑनलाइन कंपनियां नये लोगों की भर्ती कर मांग पूरी करने की कोशिश कर रही हैं, तो खुदरा व्यापारी दुकानों में अभी भी ग्राहकों का इंतजार कर रहा है। ऐसे हालात के बीच व्यापारी सरकार के विरोध में मोर्चा खोलने की तैयारी कर रहे हैं।

रोजाना 30 लाख से ज्यादा ऑनलाइन आर्डर

कोविड काल में ऑनलाइन व्यापार पर भी प्रतिबंध लगा दिया गया था। केवल आवश्यक सेवाओं को ही अनुमति दी गई थी। लेकिन एक जून से अनलॉक शुरू होने के साथ ही ऑनलाइन बाजार ने तेजी से अपने पांव जमाए हैं। ऑनलाइन बाजार किस तेजी के साथ अपने पैर जमा रहा है, इसका अंदाजा सिर्फ इस बात से लगाया जा सकता है कि इस समय न्यूनतम 30 लाख ऑनलाइन आर्डर प्रतिदिन किये जा रहे हैं। इनमें मोबाइल, कपड़े, मशीनें, चश्मे से लेकर रोजमर्रा के इस्तेमाल होने वाली दाल-सब्जी जैसी चीजें भी शामिल हैं।

अकेले अमेजन कंपनी के व्यापार में 120 से 140 फीसदी की बढ़ोतरी बताई गई है। इसी प्रकार से फ्लिपकार्ट और अन्य ऑनलाइन कंपनियों के बाजार में भी उछाल आया है। माना जा रहा है कि इस क्षेत्र में जिओमार्ट के पूरी क्षमता के साथ उतरने के बाद इस बाजार की सूरत बदल जायेगी। हालांकि, इन सभी प्लेटफॉर्म्स ने स्थानीय कारीगरों, उत्पादकों और व्यापारियों को भी जगह देने की रणनीति का एलान किया है, लेकिन व्यापारियों को डर है कि इससे उन्हें भारी व्यापार घाटा उठाना पड़ सकता है।

कितना हो सकता है नुकसान

फेडरेशन ऑफ आल इंडिया व्यापार मंडल के राष्ट्रीय महामंत्री वीके बंसल ने अमर उजाला को बताया कि अनुमानतया खुदरा क्षेत्र में 6.5 करोड़ दुकानदार छोटी-मझोले स्तर की दुकानों से अपनी जिंदगी चलाते हैं। अगर प्रति दुकानदार न्यूनतम दो लोगों के रोजगार को भी जोड़कर चलें तो ऑनलाइन बाजार के कारण न्यूनतम 13 करोड़ लोगों का रोजगार प्रभावित हो सकता है। इसके आलावा सप्लाई चेन, गोदामों और असंगठित क्षेत्र के मजदूरों को जोड़ लें तो न्यूनतम 20 करोड़ से अधिक लोगों की रोजी-रोटी को संकट पैदा हो सकता है।

एमएसएमई सहित असंगठित क्षेत्र में 44 करोड़ से अधिक लोगों को रोजगार मिलता है। इसी वर्ग के रजिस्टर्ड उद्योगों में लगभग 11 करोड़ लोगों को रोजगार मिलता है, शेष 33 करोड़ (6.5 करोड़ दुकानदार और उनके कामगर सहित) के लगभग लोग प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रूप से खुदरा बाजार से जुड़े हैं और ऑनलाइन बाजार के कारण इन सबकी रोजी रोटी पर खतरा मंडरा रहा है।

क्या करना चाहिए

वीके बंसल के मुताबिक किसी भी सरकार का काम अपने किसानों-व्यापारियों के लिए बाजार और इसके लिए उपयुक्त मंच उपलब्ध कराना है। लेकिन आज जरूरत के अनुसार अपने किसानों-व्यापारियों के लिए ऑनलाइन बाजार के अवसर भी उपलब्ध कराना चाहिए। दिल्ली व्यापार महासंघ के अध्यक्ष देवराज बावेजा के मुताबिक सरकार ने पहले केवल सिंगल ब्रांड में बड़ी कंपनियों को अनुमति देने की रणनीति अपनाई थी, लेकिन अब कंपनियां छद्म नामों से मल्टीब्रांड में भी कदम आजमा रही हैं।

इससे बड़े और थोक व्यापारियों पर भी खतरा मंडरा रहा है। एक कंपनी ने शुक्रवार को ही कमीशन फ्री व्यापार की घोषणा की है। अगर वे ऐसा करती हैं तो अपनी बड़ी पूंजी की बदौलत वे कुछ समय तक चल सकती हैं, तब तक स्थानीय व्यापारी खतम हो जाएगा। इसके बाद उनके पास मनमानी कीमत वसूलने का रास्ता खुल जाएगा।

स्वदेशी बाजार को करेंगे प्रमोट

स्वदेशी जागरण मंच के राष्ट्रीय संयोजक कश्मीरी लाल कहते हैं कि ऑनलाइन बाजार के बढ़ने से छोटे-स्थानीय बाजार को बड़ा खतरा हो रहा है। इसे देखते हुए ही ‘लोकल फॉर वोकल’ की रणनीति अपनाई गई है। इसके तहत हर जिले के विशेष उत्पाद को पहले तो स्थानीय बाजार में खपत करने के लिए अवसर बढ़ाए जाएंगे। इसके साथ ही उन्हें डिजिटल मार्केटिंग की रणनीति से भी परिचित कराया जाएगा।

उन्होंने कहा कि जहां जरूरी होगा, सरकार से ऑनलाइन बाजार की नीतियों में परिवर्तन के लिए दबाव भी डाला जाएगा। छोटी-छोटी कंपनियों को ऑनलाइन बाजार रणनीति के माहिर युवाओं से जोड़ा जाएगा। 20 सितंबर तक देश के हर उस कोरोना वारियर को सम्मानित किया जाएगा, जिसने लॉकडाउन के दौरान लोगों को जरूरी सेवाएं देने के लिए काम किया है, जबकि इसी दौरान बड़ी-बड़ी ऑनलाइन कंपनियां सेवा देने में विफल साबित हुई थीं।

बदलाव करना जरूरी

भाजपा के राष्ट्रीय प्रवक्ता और आर्थिक मामलों के जानकार गोपाल कृष्ण अग्रवाल कहते हैं कि ई-प्लेटफॉर्म्स और ई-ट्रेडिंग कंपनियों में अंतर यह है कि प्लेटफॉर्म्स पर स्थानीय बाजार के उत्पादक से लेकर वैश्विक स्तर की कंपनी तक सभी अपने उत्पाद प्रदर्शित कर लाभ कमा सकते हैं। इनसे किसी को कोई नुकसान नहीं है।  

लेकिन जब यही कंपनियां स्वयं सामान खरीदने और बेचने में लग जाती हैं तो पूंजी और रणनीति के कारण स्थानीय व्यापारियों-किराना दुकानदारों के लिए बड़ा खतरा बन जाती हैं। सामान की गुणवत्ता, सेवाओं की निश्चितता और समय की बचत के कारण ये ग्राहकों को लुभा रही हैं।

इस परिस्थिति से लड़ने के लिए सरकार कुछ हद तक ही मदद कर सकती है। अंतत: हमारे व्यापारियों और दुकानदारों को भी इस तकनीकी को स्वीकार करना ही पड़ेगा। इसलिए यह बेहतर है कि समय के साथ नई तकनीकी को सीखकर उसके अनुरूप ग्राहकों से जुड़ा जाए जिससे इनका सही मुकाबला किया जा सके।

सार

  • कोविड काल में बाजारों में निकलने से डर रहे लोग ऑनलाइन बाजार को दे रहे प्राथमिकता    
  • रोज किए जा रहे 30 लाख से ज्यादा ऑनलाइन आर्डर, जबकि स्थानीय दुकानदार बैठे खाली  

विस्तार

कोरोना काल में जरूरी सामानों की खरीद ऑनलाइन माध्यम से ज्यादा हो रही है। इससे ऑनलाइन व्यापार तेजी से मजबूत हो रहा है, तो इसी के साथ छोटे-मझोले दुकानदारों पर उनकी रोजी-रोटी छिनने का खतरा भी मंडराने लगा है। ऑनलाइन बाजार में अलग-अलग क्षेत्रों में 50 से 70 फीसदी प्रतिवर्ष तक की बढ़ोतरी दर्ज की जा रही है। इससे खुदरा और असंगठित क्षेत्र में करोड़ों लोगों की नौकरियों पर खतरा पैदा हो गया है। त्योहारी सीजन की शुरुआत के साथ ही ऑनलाइन कंपनियां नये लोगों की भर्ती कर मांग पूरी करने की कोशिश कर रही हैं, तो खुदरा व्यापारी दुकानों में अभी भी ग्राहकों का इंतजार कर रहा है। ऐसे हालात के बीच व्यापारी सरकार के विरोध में मोर्चा खोलने की तैयारी कर रहे हैं।

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