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नई दिल्ली10 मिनट पहले

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  • होम लोन प्रोटेक्शन स्कीम एक टर्म इंश्योरेंस की तरह ही है
  • आप जिस बैंक या NBFC से लोन लेते हैं, वो भी आपको होम लोन इश्योरेंस उपलब्ध कराता है

मौजूदा समय में ज्यादातर लोग घर खरीदने या बनवाने के लिए लोन का सहारा लेते हैं। लेकिन ऐसे परिवार जहां कमाने वाला सिर्फ एक ही व्यक्ति हो, उन परिवारों के लिए अमूमन 15 से 20 सालों तक चलने वाला होम लोन किसी बोझ से कम नहीं होता। क्योंकि उस व्यक्ति की नौकरी छूटने, गंभीर बीमारी से ग्रसित होने और आकस्मिक दुर्घटना में मृत्यु होने पर होम लोन की ईएमआई चुकाने का टेंशन बढ़ जाता है। ऐसे में होम लोन इंश्योरेंस मददगार साबित होता है। होम लोन इंश्योरेंस को आमतौर पर होम लोन प्रोटेक्शन प्लान भी कहा जाता है। आज हम आपको होम लोन के बारे में बता रहे हैं।

क्या है होम लोन इंश्योरेंस?
होम लोन प्रोटेक्शन स्कीम एक टर्म इंश्योरेंस की तरह है, यानी बीमा की अवधि आप खुद तय कर सकते हैं। बीमा की अवधि के हिसाब से आपका प्रीमियम तय होता है। अगर लोन लेने वाले की मृत्यु हो जाती है तो बाकी की किस्त इसी बीमा के जरिए जमा हो जाती है और आपका घर सुरक्षित रहता है।

क्यों लेना चाहिए कवरॽ
होम लोन के साथ एक बड़ी देनदारी बन जाती है। कर्ज लेने वाले की मौत हो जाने की स्थिति में कर्ज चुकाने की जिम्मेदारी परिवार के दूसरे सदस्यों पर आ जाती है। बीमा कवर होने से यह बोझ दूसरों पर नहीं पड़ता है। कई बार बैंक भी इंश्योरेंस की प्रीमियम राशि को ईएमआई में मर्ज कर देते हैं, फिर भी इससे ईएमआई बहुत ज्यादा नहीं बढ़ती।

होम लोन इंश्योरेंस का फायदा कब मिलेगा और कब नहीं?
लोन लेने वाले व्‍यक्ति की दुर्घटना में मृत्‍यु या स्थायी रूप से पूर्ण विकलांग होने पर होम लोन इंश्योरेंस कवर देता है। लोन लेने वाले व्‍यक्ति की गंभीर बीमारी में भी इंश्योरेंस कवर मिलता है। किसी कारण बस लोन लेने वाले व्‍यक्ति की नौकरी छूट जाती है, तो तीन मासिक किस्तों का भुगतान बीमा कंपनी करती है। वहीं होम लोन किसी और के नाम शिफ्ट करते हैं या समय के पहले बंद करते हैं तो बीमा कवर खत्म हो जाता है। स्वाभाविक मृत्यु या आत्महत्या के मामले भी होम लोन प्रोटेक्शन प्लान के दायरे में नहीं आते हैं। हालांकि अगर आप लोन को दूसरे बैंक में ट्रांसफर कराते हैं, प्री-पेमेंट या रिस्ट्रक्चर कराते हैं तो होम लोन इंश्योरेंस पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता।

क्या इसे लेना अनिवार्य है?
रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया हो या बीमा नियामक इरडा किसी ने भी ऐसा कोई नियम नहीं बनाया है कि होम लोन के साथ बीमा लेना आवश्यक है। हालांकि कई बैंक या फाइनेंस देने वाले इस तरह के इंश्योरेंस की राशि ग्राहकों को लोन में जोड़कर ही बताने लगे हैं। बावजूद इसके लोन के साथ इंश्योरेंस प्लान खरीदने या नहीं खरीदने का फैसला पूरी तरह से ग्राहक पर निर्भर करता है। लोन लेने वाले को कवर खरीदने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता है।

होम इंश्योरेंस और होम लोन इंश्योरेंस में क्या अंतर है?
होम इंश्योरेंस और होम लोन इंश्योरेंस में फर्क समझना बहुत जरूरी है। होम इंश्योरेंस में घर और उसमें मौजूद समानों की चोरी, प्राकृतिक आपदाओं आदि से होने वाले नुकसानों से कवर मिलता है। वहीं, अगर किसी कारण बस होम लोन लिए हुए व्‍यक्ति को कुछ हो जाता है तो होम लोन इंश्योरेंस ईएमआई चुकाने में मदद करता है। हालांकि, होम लोन पर इंश्योरेंस लेने से पहले बीमा पॉलिसी के नियमों को सावधानी पूर्वक से पढ़ना चाहिए।

कहां से ले सकते हैं लोन इंश्योरेंस?
आप जिस बैंक या नॉन बैंकिंग फाइनेंशियल कंपनी (NEFC) से लोन लेते हैं तो वो भी आपको होम लोन इश्योरेंस उपलब्ध कराती हैं। इसके अलावा अगर आप वहां से इंश्योरेंस नहीं लेना चाहते हैं तो इंश्योरेंस बेचने वाली कंपनियों से भी होम लोन इंश्योरेंस ले सकते हैं।

कितना देना होता है प्रीमियम?
इंश्योरेंस का प्रीमियम कुल कर्ज की राशि का 2 से 3 फीसदी होता है। बीमा कंपनियां इंश्योरेंस का प्रीमियम लोन की रकम, लोन की अवधि, लोन लेने वाले व्‍यक्ति की आयु और आय को देखकर तय करती हैं।

बैंक से लोन के साथ ही इंश्योरेंस लेने पर EMI कितनी बढ़ जाएगी?
इस तरह की बीमा पॉलिसियां आमतौर पर नियमित वार्षिक भुगतान की जगह सिंगल प्रीमियम ऑप्शन वाली होती हैं। मान लीजिए कि आपका बैंकर आपके लिए 22 लाख रुपए का होम लोन मंजूर करता है और बीस साल के लिए 90,000 रुपए के सिंगल प्रीमियम पर होम लोन कवर मुहैया करता है तो आपका कुल लोन 22.90 लाख रुपए का हो जाता है। अगर ब्याज दर 10 फीसदी सालाना का मानें तो आपकी ईएमआई 20,169 रुपए की होगी।

वहीं अगर आपने बीमा कवर नहीं लिया होता तो आपका लोन सिर्फ 22 लाख रुपए का होता और ईएमआई 20 साल के लिए 19,300 रुपए होती। इस तरह आपका ईएमआई बीस साल के लिए हर महीने 869 रुपए कम हो जाएंगे। इसका मतलब यह है कि अगर आप होम लोन इंश्योरेंस लेते हैं तो आपको लोन की पूरी अवधि में 208,560 रुपए अतिरिक्त देने पड़ते हैं, जबकि बैंक ने इसके लिए सिर्फ 90,000 रुपए ही दिए हैं। वह इस राशि पर ब्याज भी हासिल कर रहा है।

सिंगल और सालाना प्रीमियम में से क्या है बेहतर?
सिंगल प्रीमियम भुगतान वाली पॉलिसी का दो फायदा और एक नुकसान होता है। पहला फायदा यह है कि आपको इसमें रीन्यूअल डेट के लिए परेशान नहीं रहना पड़ता क्योंकि इसमें कोई रीन्यूअल नहीं होता। दूसरा फायदा यह है कि ऐसे उत्पाद सस्ते पड़ते हैं क्योंकि इसमें कमीशन 2 फीसदी तक सीमित होता है, बीमा कंपनी को निवेश पर बेहतर रिटर्न मिलता है और इसमें सर्विस चार्ज कम होते हैं।
सिंगल प्रीमियम पॉलिसी का नुकसान यह है कि अपफ्रंट के रूप में जो एकमुश्त राशि देनी पड़ती है वह काफी बड़ी होती है। मान लीजिए कि कोई 40 साल का व्यक्ति एक करोड़ रुपए सम एश्योर्ड के लिए 30 साल की इंश्योरेंस पॉलिसी लेता है। इसके लिए सिंगल प्रीमियम 3.3 लाख रुपए और सालाना नियमित प्रीमियम 23,000 रुपए का होगा।

ज्यादातर लोग 23,000 रुपए सालाना प्रीमियम देना पसंद करते हैं, भले ही इस तरह 30 साल में 6.9 लाख रुपए देने पड़ें। क्योंकि सालाना प्रीमियम देना पॉकेट के हिसाब से सही होता है और लोगों के पास विकल्प होता है कि भविष्य में इसकी जरूरत न होने पर इसे बंद कर दें।

क्या इनकम टैक्स का लाभ मिलेगा?
आप होम लोन की तरह इसके बीमा पर भी आयकर की धारा 80सी के रुपए आयकर छूट का लाभ भी उठा सकते हैं। हालांकि अगर आपने होम लोन प्रोटेक्शन कवर का प्रीमियम भी बैंक से लोन ले रखा है तो यह आपकी ईएमआई में जुड़ेगा और आपको ज्यादा लाभ नहीं होगा।

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